IFS अधिकारी, जिसका केस सुनने से 14 जजों ने कर दिया मना!!!

यह कहानी है एक IFS अधिकारी की, जिनके मामले की सुनवाई अब तक 14 न्यायाधीशों ने करने से इनकार कर दिया है। उनका नाम संजीव चतुर्वेदी है। IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी का मामला इन दिनों सुर्खियों में है।
IFS संजीव चतुर्वेदी कौन हैं?
संजीव चतुर्वेदी उत्तराखंड कैडर के 2002 बैच के आईएफएस अधिकारी हैं। 21 दिसंबर, 1974 को जन्मे संजीव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 1995 में मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNNIT), प्रयागराज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। लेकिन वे देश की सेवा करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने सिविल सेवा का मार्ग चुना।संजीव चतुर्वेदी ने 2002 में भारतीय सुरक्षा बल (IFS) में सिविल सेवा में प्रवेश लिया। आईएफएस अधिकारी बनने के बाद, संजीव को दो साल के प्रशिक्षण के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून भेजा गया। यहाँ उन्हें वन प्रबंधन, वन्यजीव संरक्षण और प्रशासन का प्रशिक्षण दिया गया। 2002 में चयन के बाद, उन्हें पहले हरियाणा कैडर मिला जहाँ उन्होंने 2005 से 2012 तक सेवा की। बाद में उनका तबादला उत्तराखंड कैडर में हो गया जहाँ वे हल्द्वानी में मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) के पद पर तैनात हैं।
सात वर्षों में 12 तबादले!!!
IFS संजीव चतुर्वेदी अपने कार्यकाल के दौरान काफी सुर्खियों में रहे। हरियाणा में सात साल में उनका 12 बार तबादला हुआ। हरियाणा में उन्होंने हिसार और झज्जर में वृक्षारोपण योजना में धन के दुरुपयोग और अनियमितताओं का पर्दाफाश किया। इसके बाद राज्य सरकार ने उन्हें कई महीनों तक पोस्टिंग से दूर रखा। फिर उन्हें गैर-कैडर पद पर भेजा गया और एक बार फिर उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया, लेकिन केंद्र सरकार ने दो बार हस्तक्षेप करके राज्य के फैसलों को पलट दिया। सात साल में 12 बार तबादलों के बावजूद वे सीबीआई जांच की मांग पर अडिग रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। विशेष रूप से 2012-16 के दौरान उन्होंने एम्स में भ्रष्टाचार के 200 से अधिक मामलों का पर्दाफाश किया, जिसके लिए उन्हें 2015 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला। हालांकि, यह सब आसान नहीं था। संजीव को तबादलों, निलंबन और अब अदालती मुकदमे का सामना करना पड़ा।
न्यायाधीश पद क्यों छोड़ रहे हैं?
2013 से अब तक 14 न्यायाधीश इस मामले से खुद को अलग कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई (2013) और यूयू ललित (2016) ने भी संजीव की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका से खुद को अलग कर लिया था। 2018 में, शिमला की एक अदालत के न्यायाधीश ने भी मानहानि के उस मामले से खुद को अलग कर लिया था जिसमें हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव विनीत चौधरी ने संजीव पर मुकदमा किया था। 2019 में, सीएटी के अध्यक्ष जस्टिस नरसिम्हन रेड्डी ने अप्रत्याशित घटनाक्रमों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। हाल ही में फरवरी 2025 में, सीएटी के न्यायाधीश हरविंदर कौर ओबेरॉय और बी आनंद ने भी बिना कोई कारण बताए इस्तीफा दे दिया।
- भ्रष्टाचार के खिलाफ योद्धा: उन्होंने हरियाणा में अवैध कटाई और खनन के घोटालों का पर्दाफाश किया। इसके बाद, 2012 से 2014 के बीच AIIMS (दिल्ली) में मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) के रूप में काम करते हुए उन्होंने सरकारी खरीद में अनियमितताओं के करीब 200 मामलों की जांच की।
- सबसे युवा मैक्ससे विजेता: मात्र 40 वर्ष की आयु में वे रेमन मैक्ससे पुरस्कार पाने वाले भारत के सबसे युवा सिविल सेवक बने।
- अनोखा कानूनी रिकॉर्ड: 2025 की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनके मामलों की सुनवाई से अब तक 16 जजों ने खुद को अलग (recuse) कर लिया है, जो भारतीय न्यायिक इतिहास में एक दुर्लभ मामला है।
- बार-बार तबादले और उत्पीड़न: भ्रष्टाचार उजागर करने के कारण उन्हें अपने करियर में अब तक 12 से अधिक बार तबादलों और कई विभागीय कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा है।
- पर्यावरण संरक्षण: उत्तराखंड में तैनाती के दौरान उन्होंने भारत का पहला मॉस गार्डन (Moss Garden) और लाइकेन पार्क विकसित करने जैसे महत्वपूर्ण नवाचार किए हैं।
वह IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी (2002 बैच) हैं। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह अपनी तरह का पहला मामला है जहाँ दिसंबर 2025 की रिपोर्टों के अनुसार, अब तक कुल 16 जजों ने उनके मामलों की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) कर लिया है।
इस मामले से जुड़ी मुख्य जानकारी इस प्रकार है:
- रिकॉर्ड संख्या: जुलाई 2025 तक यह संख्या 14 थी, लेकिन अक्टूबर 2025 तक बढ़कर 16 हो गई है। इन 16 जजों में सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व न्यायाधीश (जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस यू.यू. ललित), उत्तराखंड हाईकोर्ट के चार न्यायाधीश, जिला अदालतों के दो जज और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के 8 सदस्य शामिल हैं।
- ताजा मामला (अक्टूबर 2025): उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस आलोक वर्मा 16वें जज बने जिन्होंने संजीव चतुर्वेदी द्वारा CAT के सदस्यों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।
- मुख्य न्यायाधीश का हस्तक्षेप: जजों के बार-बार हटने के कारण, अक्टूबर 2025 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्रन ने एक विशेष आदेश जारी किया कि अब संजीव चतुर्वेदी से जुड़े सभी लंबित मामलों की सुनवाई वे स्वयं (चीफ जस्टिस की बेंच) करेंगे।
- विवाद का कारण: संजीव चतुर्वेदी एक व्हिसलब्लोअर अधिकारी हैं जिन्होंने हरियाणा और एम्स (दिल्ली) में भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों का खुलासा किया था। वे अपनी सत्यनिष्ठा के लिए 2015 में रेमन मैक्ससे पुरस्कार भी जीत चुके हैं। उनके कानूनी मामले अक्सर प्रभावशाली राजनेताओं और नौकरशाहों से जुड़े भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के इर्द-गिर्द होते हैं।
जजों के इस तरह केस छोड़ने को कानूनी विशेषज्ञों ने “न्याय से इनकार” और एक असामान्य स्थिति बताया है, क्योंकि अधिकांश मामलों में जजों ने हटने का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया।



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